42080: वुञ्छण्कठजिलसेनिरढञ्ण्ययफक्फिञिञ्ञ्यकक्ठकोऽरीहणकृशाश्वर्श्यकुमुदकाशतृणप्रेक्षाऽश्मसखिसंकाशबलपक्षकर्णसुतंगमप्रगदिन्वराहकुमुदादिभ्यः¶
Padacheda: वुञ्-छण्-क-ठच्-इल्-स-इनि-र-ढञ्-ण्य-य-फक्-फिञ्-इञ्-ञ्य-कक्-ठकः | S | 1 | 3 |
अरीहण-कृशाश्व-ऋश्य-कुमुद-काश-तृण-प्रेक्षा-अश्म-सखि-संकाश-बल-पक्ष-कर्ण-सुतङ्गम-प्रगदिन्-वराह-कुमुदादिभ्यः | S | 5 | 3 |
Sutrartha¶
Vasu English Summary¶
In the above 4-senses are added the following 17-affixes after the following 17 classes of words respectively - ……………………………………………….
Vasu English Translation¶
In the above 4-senses are added the following 17-affixes after the following 17 classes of words respectively - ………………………………………………. The above affixes वुञ् &c. are applied to the above classes of words. आदि is to be added to every one of the above seventeen words. The first part of the sutra upto ठक् gives the seventeen affixes, and the latter part gives the seventeen word-class. The allotment or assignment of affixes is made by (1.3.10).
The examples of the above are: (1) आ꣡रीहणकम्, द्रौ꣡घणकम् (2) कार्श्वाश्वी꣡यः, आर꣡ष्टीयः, (3) ऋश्यकः꣡, न्यग्रोधकः꣡, (4) कुमुदिक꣡म्, शर्क्करिक꣡म्, (5) वाशि꣡लम्, काशि꣡लम्, (6), तृणसः꣡, नडसः꣡, (7) प्रेक्षिन्꣡, हलकिन्, (8) अश्मरः꣡, (9) सा꣡खेयम्, सा꣡खिदत्तेयम्, (10) सांकाश्य꣡म्, काम्पिल्य꣡म्, (11) बल्यः꣡, कल्य꣡म्, (12) पाक्षायणः꣡, तौषायणः꣡, (13) का꣡र्णायनिः, वा꣡सिष्ठायनिः, (14) सौत꣡ङ्गमिः, मौ꣡निचित्तिः, (15) प्रा꣡गद्य (16) वाराहक꣡म्, पालाशक꣡म्, and (17) lastly कौमुदिक꣡म् ॥
The word शिरीष will be seen, by referring to the above lists, to occur in three classes viz अरीहणादि, (36), कुमुदादि (14), and वराहादि (3), Moreover it is governed by the general affix अण् also in the quadruple sense, according to the opinion of Patanjali. And because it occurs in the वरणादि class (4.2.82), therefore this universal अण् (4.1.83) will be elided after it. As we have already shown before under (1.2.5) when शिरीषवन was formed from शिरीषाः ॥
1 अरीहण, 2 दुघ्रण, 3 द्रुहण, 4 भगल, 5 उलन्द, 6 किरण, 7 सांपरायण, 8 क्रोष्ट्रायण, 9 औष्ट्रायण, 10 त्रैगर्तायन, 11 मैत्रायण, 12 भास्त्रायण, 13 वैमतायन (also वैमत्तायन), 14 गौमतायन (गो), 15 सौमतायन, 16 सौसायन, 17 धौमतायन, 18 सौमायन,19 ऐन्द्रायण,20 कौन्द्रायण, 21 खाडायन, 22 शाण्डिल्यायन, 23 रायस्तोष, 24 विपथ, 25 विपाश, 26 उद्दण्ड, 27 उदञ्चन, 28 खाण्डवीरण (खाण्ड), 29 वीरण, 30 काशकृत्स्न (कश.), 31 जाम्बवत (वन्त), 32 शिंशपा, 33 रैवत (रेवत), 34 बिल्व (बैल्व K.) 35 सुयज्ञ, 36 शिरीष, 37 बधिर, 38 जम्बु 39 खदिर, 40 सुशर्मन् (सुशर्म K.), 41 दलतृ, 42 भलन्दन, 43 खण्डु, 44 कनल (कलन), 45 यज्ञदत्त, 46 सार, 47 वैगर्तायण (sic) and 48 खाण्डायन.
1 कृशाश्व, 2 अरिष्ट, 3 अरिश्म (अरीश्व), 4 वेश्मन्, 5 विशाल, 6 लोमश, 7 रोमश, 8 रोमक, 9 लोमक, 10 शबल, 11 कूट, 12 वर्चल, 13 सुर्वचल, 14 सुकर, 15 सूकर, 16 प्रतर (प्रातर), 17 सदृश, 18 पुरग, 19 पुराग, 20 सुख, 21 धूम, 22 अजिन, 23 विनत (विनता, वनिता), 24 अवनत, 25 विकुट्यास (v.1. कुविद्यास; विकुघास), 26 पराशर, 27 अरुस्, 28 अयस्, 29 मौद्गल्य, 30 यूकर (मौद्गल्याकर). 31 रोमन्, 32 बर्बर, 33 अवयास and अयावस्
1 ऋश्य, 2 न्यग्रोध, 3 शर (शिरा), 4 निलीन, 5 निवास, 6 निवात, 7 निधान, 8 निबन्ध (v.1. निबन्धन; निबद्ध) 9 विबद्ध, 10 परिगूढ, 11 उपगूढ, 12 असनि, 13 सित, 14 मत, 15 वेश्मन्, 16 उत्तराश्मन्, 17 अश्मन्, 18 स्थूल, 19 बाहु (स्थूलबाहु), 20 खदिर, 21 शर्करा, 22 अनडुह्, 23 अरडु, 24 परिवंश, 25 वेणु, 26 वीरण, 27 खण्ड, 28 दण्ड, 29 परिवृत्त, 30 कर्दम, 31 अंशु.
1 कुमुद, 2 शर्करा, 3 न्यग्रोध, 4 इक्कट (इत्कट, उत्कट), 5 सङ्कट, 6 कङ्कट, 7 गर्त, 8 बीज, 9 परिवाप, 10 निर्यास, 11 शकट, 12 कच, 13 मधु, 14 शिरीष, 15 अश्व, 16 अश्वत्थ, 17 बल्बज, 18 यवाष, 19 कूप, 20 विकङ्कत, 21 दशग्राम. 22 कण्टक, 23 पलाश, 24 त्रिक, 25 कत.
1 काश, 2 पाश (वाश) 3 अश्वत्थ, 4 पलाश, 5 पीयूक्षा (पीयूष), 6 चरण, 7 वास, 8 नड, 9 वन, 10 कर्दम, 11 कच्छूल्, 12 कङ्कट, 13 गुहा, 14 बिस (विश and विस), 15 तृण, 16 कर्पूर, 17 बर्बर, 18 मधुर, 19 ग्रह (गुह) 20 कपित्थ, 21 जतु, 22 शीपालः 23 नर, 24 कंटक.
1 तृण, 2 नड, 3 मूल, 4 वन, 5 पर्ण, 6 वर्ण, 7 वराण, 8 बिल, 9 पुल, 10 फल, 11 अर्जुन, 12 अर्ण, 13 सुवर्ण, 14 बल, 15 चरण, 16 बुस, 17 जन, 18 लव.
1 प्रेक्षका, 2 हलका (फलका), 3 बन्धुका. 4 ध्रुवका, 5 क्षिपका 6 न्यग्रोध, 7 इक्कट (इर्कट) 8 कङ्कट (कर्कटा), 9 संकट, 10 कट, 11 कूप, 12 बुक, 13 पुक, 14 पुट, 15 मह (महा), 16 परिवाप, 17 यवाष (d.i. यवास), 18 धुवका, 19 गर्त, 20 कूपक (कूपका) 21 हिरण्य. 22 बुधका, 23 सुकटा, 24 मङ्कट, 25 मुक.
1 अश्मन्, 2 यूथ (also युष), 3 ऊष (रूष and रुष), 4 मीन, 5 नद, 6 दर्भ, 7 वृन्द, 8 गुद, 9 खण्ड, 10 नग, 11 शिखा, 12 कोट (काट), 13 पाम (पांम !), 14 कन्द, 15 कान्द, 17 गह्व,18 गुड, 19 कूण्डल, 20 पीन, 21 गह.
1 सखि, 2 अग्निदत्त, 3 वायुदत्त, 4 सखिदत्त, 5 गोपिल (गोहित and गोहिल), 6 भल्ल 7 पाल (भल्लपाल st. भल्ल, पाल), 8 चक्र (चर्क), 9 चक्रवाक, 10 छगल, 11 अशोक, 12 करवीर, 13 वासव,14 वीर, 15 पूर, 16 वज्र, 17 कुशीरक, 18 सोहर (शोहर; सोकर), 19 सरक (सकर), 20 सरस, 21 समर, 22 समल, 23 सुरस, 24 रोह, 25 तमाल, 26 कदल, 27 सप्तल, 28 चक्रपाल, 29 चक्रवाल, 30 वक्रपाल, 31 उशीर ॥
1 संकाश, 2 कम्पिल, 3 कश्मीर (कश्मर), 4 समीर, 5 सूरसेन (शूर), 6 सरक 7 सूर,8 सुपन्थिन् (rightly सुपथिन्), पन्थ (सक्थ !) च, 9 यूप (यूथ), 10 अंश, 11 अंङ्ग, 12 नासा, 13 पलित, 14 अनुनाश, 15 अश्मन्, 16 कूट, 17 मलिन, 18 दश, 19 कुम्भ, 20 शीष, 21 विरत (चिरन्त; बिरत !), 22 समल, 23 सीर, 24 पञ्जर, 25 मन्थ, 26 नल,27 रोमन, 28 लोमन्, 29 पुलिन, 30 सुपरि, 31 कटिप, 32 सकर्णक, 33 वृष्टि, 34 तीर्थ, 35 अगस्ति, 36 विकर, 37 नासिका, 38 एग, 39 चिकार, 40 विरह,
1 बल, 2 चुल (बुल), 3 नल, 4 दल, 5 वट, 6 लकुल, 7 उरल, 8 पुल, 9 मूल, 10 उल, 11 डुल, 12 वन, 13 कुल, 14 तुल, 15 कवल,
1 पक्ष, 2 तुक्ष, 3 तुष, 4 कुण्ड, 5 अण्ड, 6 कम्बलिका (कम्बलिक), 7 वलिक, 8 चित्र 9 अस्ति, 10 पथिन् पन्थ च (also पान्थायन), 11 कुम्भ, 12 सीरक (सीरज), 13 सरक, 14 सकल (सलक), 15 सरस, 16 समल, 17 अतिश्वन् (स्वन्). 18 रोमन्, 19 लोमन्, 20 हस्तिन्, 21 मकर, 22 लोमक, 23 शीर्ष, 24 निवात, 25 पाक, 26 सिंहक, 27 अंकुश, 28 सुवर्णक, 29 हंसक (हंसका), 30 हिंसक, 31 कत्स, 32 बिल, 33 खिल, 34 यमल, 35 हस्त, 36 कला, 37 सकर्णक (सकण्डक), 38 अश्मन्, 39 अस्तिबल ॥
1 कर्ण, 2 वसिष्ठ, 3 अर्क, 4 अर्कलूष (लूष), 5 द्रुपद (डुपद), 6 आनडुह्य (अन), 7 पाञ्चजन्य 8 स्फिज, 9 कुम्भी, 10 कुन्ती, 11 जित्वन् (जित्व), 12 जीवन्त (जीवन्ती), 13 कुलिश, 14 आण्डीवत (आण्डीवत्), 15 जब, 16 जैत्र, 17 आनक, 18 अलुश,19 शल, 20 स्थिरा ॥
1 सुतंगम, 2 मुनिचित (चित्त), 3 विप्रचित (चित्त), 4 महाचित्त, 5 महापुत्र, 6 स्वन, 7 श्वेत, 8 खडिक (गडिक) 9 शुक्र, 10 विग्र, 11 वीजवापिन्, 12 अर्जुन, 13 श्वन्, 14 अजिर, 15 जीव, 16 खण्डिन, 17 कर्ण, 18 विग्रह,
1 प्रगदिन्, 2 मगदिन्, 3 मददिन्, (शरदिन्), 4 कविल (कलिव), 5 खण्डित (खडिव), 6 गदित (गदिव), 7 चूडार, 8 मडार (मार्जार), 9 मन्दार, 10 कोविदार ॥
1 वराह, 2 पलाश, 3 शिरीष, 4 पिनद्ध, 5 निबद्ध, 6 बलाह, 7 स्थूल (स्थूण), 8 विदग्ध, 9 विजग्ध, 10 विभग्न, 11 निमग्न, 12 बाहु, 13 खदिर, 14 शर्करा, 15 विनद्ध, 16 विरुद्ध 17 मूल ॥
1 कुमुद, 2 गोमय, 3 रथकार, 4 दशग्राम, 5 अश्वत्थ, 6 शालमलि (ली), 7 शिरीष, 8 मुनिस्थल, (स्थूल), 9 कुण्डल, 10 कूट, 11 मधूकर्ण, 12 घासकुन्द, 13 शुचिकर्ण, 14 मुचुकर्ण, 15 कुन्द ॥
Kashika¶
वुञादयः सप्तदश प्रत्ययाः, अरीहणादयोऽपि सप्तदशैव प्रातिपदिकगणाः। आदिशब्दः प्रत्येकमभिसंबध्यते। तत्र यथासंख्यं सप्तदशभ्यः प्रातिपदिकगणेभ्यः सप्तदश प्रत्यया भवन्ति चातुरर्थिकाः। अणोऽपवादः। यथासंभवमर्थसंबन्धः। अरीहणादिभ्यो वुञ् प्रत्ययो भवति। आरीहणकम्। द्रौघणकम्॥ अरीहण। द्रुघण। खदिर। सार। भगल। उलन्द। साम्परायण। क्रौष्ट्रायण। भास्त्रायण। मैत्रायण। त्रैगर्तायन। रायस्पोष। विपथ। उद्दण्ड। उदञ्चन। खाडायन। खण्ड। वीरण। काशकृत्स्न। जाम्बवन्त। शिंशपा। किरण। रैवत। बैल्व। वैमतायन। सौसायन। शाण्डिल्यायन। शिरीष। बधिर। अरीहणादिः॥ कृशाश्वादिभ्यश्छण् प्रत्ययो भवति। कार्शाश्वीयः। आरिष्टीयः॥ कृशाश्व। अरिष्ट। अरीश्व। वेश्मन्। विशाल। रोमक। शबल। कूट। रोमन्। वर्वर। सुकर। सूकर। प्रतर। सदृश। पुरग। सुख। धूम। अजिन। विनता। अवनत। विकुघास। अरुस्। अवयास। मौद्गल्य। कृशाश्वादिः॥ ऋश्यादिभ्यः कः प्रत्ययो भवति। ऋश्यकः। न्यग्रोधकः॥ ऋश्य। न्यग्रोध। शिरा। निलीन। निवास। निधान। निवात। निबद्ध। विबद्ध। परिगूढ। उपगूढ। उत्तराश्मन्। स्थूलबाहु। खदिर। शर्करा। अनडुह्। परिवंश। वेणु। वीरण। ऋश्यादिः॥ कुमुदादिभ्यष्ठच् प्रत्ययो भवति। कुमुदिकम्। शर्करिकम्॥ कुमुद। शर्करा। न्यग्रोध। इत्कट। गर्त। बीज। अश्वत्थ। बल्बज। परिवाप। शिरीष। यवाष। कूप। विकङ्कत। कुमुदादिः॥ काशादिभ्य इलः प्रत्ययो भवति। काशिलम्। वाशिलम्॥ काश। वाश। अश्वत्थ। पलाश। पीयूष। विश। तृण। नर। चरण। कर्दम। कर्पूर। कण्टक। गृह। काशादिः॥ तृणादिभ्यः सः प्रत्ययो भवति। तृणसः। नडसः॥ तृण। नड। बुस। पर्ण। वर्ण। चरण। अर्ण। जन। बल। लव। वन। तृणादिः॥ प्रेक्षादिभ्य इनिप्रत्ययो भवति। प्रेक्षी। हलकी॥ पे्रक्षा। हलका। बन्धुका। ध्रुवका। क्षिपका। न्यग्रोध। इर्कुट। प्रेक्षादिः॥ अश्मादिभ्यो रप्रत्ययो भवति। अश्मरः॥ अश्मन्। यूष। रूष। मीन। दर्भ। वृन्द। गुड। खण्ड। नग। शिखा। अश्मादिः॥ सख्यादिभ्यो ढञ् प्रत्ययो भवति। साखेयम्। साखिदत्तेयम्॥ सखि। सखिदत्त। वायुदत्त। गोहित। भल्ल। पाल। चक्रपाल। चक्रवाल। छगल। अशोक। करवीर। सीकर। सकर। सरस। समल। सख्यादिः॥ संकाशादिभ्यो ण्यप्रत्ययो भवति। सांकाश्यम्। काम्पिल्यम्॥ संकाश। काम्पिल्य। समीर। कश्मर। शूरसेन। सुपथिन्। सक्थच। यूप। अंश। एग। अश्मन्। कूट। मलिन। तीर्थ। अगिस्त। विरत। चिकार। विरह। नासिका। संकाशादिः॥ बलादिभ्याे यः प्रत्ययो भवति। बल्यः। कुल्यम्॥ बल। वुल। तुल। उल। डुल। कवल। वन। कुल। बलादिः॥ पक्षादिभ्यः फक् प्रत्ययो भवति। पाक्षायणः। तौषायणः॥ पक्ष। तुष। अण्ड। कम्बलिक। चित्र। अश्मन्। अतिस्वन्। पथिन् पन्थ च (ग० सू० ८९)। पक्षादिः॥ कर्णादिभ्यः फिञ् प्रत्ययो भवति। कार्णायनिः। वासिष्ठायनिः॥ क र्ण। वसिष्ठ। अलुश। शल। डुपद। अनडुह्य। पाञ्चजन्य। स्थिरा। कुलिश। कुम्भी। जीवन्ती। जित्व। आण्डीवत्। कर्णादिः॥ सुतङ्गमादिभ्य इञ् प्रत्ययो भवति। सौतङ्गमिः। मौनिचित्तिः॥ सुतङ्गम। मुनिचित्त। विप्रचित्त। महापुत्र। श्वेत। गडिक। शुक्र। विग्र। बीजवापिन्। श्वन्। अर्जुन। अजिर। जीव। सुतङ्गमादिः॥ प्रगदिन्नादिभ्यो ञ्यः प्रत्ययो भवति। प्रागद्यम्॥ प्रगदिन्। मगदिन्। शरदिन्। कलिव। खडिव। गडिव। चूडार। मार्जार। कोविदार। प्रगद्यादिः॥ वराहादिभ्यः कक् प्रत्ययो भवति। वाराहकम्। पालाशकम्॥ वराह। पलाश। शिरीष। पिनद्ध। स्थूण। विदग्ध। विजग्ध। विभग्न। बाहु। खदिर। शर्करा। वराहादिः॥ कुमुदादिभ्यष्ठक् प्रत्ययो भवति। कौमुदिकम्॥ कुमुद। गोमथ। रथकार। दशग्राम। अश्वत्थ। शाल्मली। कुण्डल। मुनिस्थूल। कूट। मुचुकर्ण। कुमुदादिः॥ शिरीषशब्दोऽरीहणादिषु, कुमुदादिषु, वराहादिषु च पठ्यते, औत्सर्गिकोऽपि तत इष्यते, तस्य च वरणादिषु दर्शनाल् लुब् भवति। तथा चोक्तम् — शिरीषाणामदूरभवो ग्रामः शिरीषाः, तस्य वनं शिरीषवनम् (का० १.२.५१) इति ॥
Siddhanta Kaumudi¶
एभ्यः सप्तदशभ्यः सप्तदश क्रमात्स्युस्चतुरर्थ्याम् । अरीहणादिभ्यो वुञ् । अरीहणेन निर्वृत्तमारीहणकम् । कृशाश्वादिभ्यश्छण् । कार्शाश्वीयम् । ऋस्यादिभ्यः कः । ऋश्यकम् । कुमुदादिभ्यष्ठच् । कुमुदिकम् । काशादिभ्य इलः । काशिलः । तृणादिभ्यः सः । तृणसम् । प्रेक्षादिभ्य इनिः । प्रेक्षी । अश्मादिभ्यो रः । अश्मरः । सख्यादिभ्यो ढञ् । साखेयम् । सङ्काशादिभ्यो ण्यः । साङ्काश्यम् । बलादिभ्यो यः । बल्यम् । पक्षादिभ्यः फक् । पाक्षायणः । (गणसूत्रम् -) पथः पन्थ च ॥ पान्थायनः । कर्णादिभ्यः फिञ् । कार्णायनिः । सुतङ्गमादिभ्य इञ् सौतङ्गमिः । प्रगद्यादिभ्यो ञ्यः । प्रगदिन्, प्रागद्यः । वराहादिभ्यः कक् । वारीहकः । कुमुदादिभ्यष्ठक् । कौमुदीकः ॥
Tattvabodhini¶
वुञ्छण्। `ठक`इत्यन्तमेकं समस्तं पदम्। अरीहणादि त्वपरम्। तत्र प्रथमतः कुमुदान्तानां चतुर्णां द्वन्द्वं विधाय, द्वितीयेन काशादिकुमुदान्तद्वन्द्वेन सह पुनर्द्वन्द्वो बोध्यः। तेन कुमुदशब्दस्य द्विःपाठेऽपि नैकसेषः। आदिशब्दः प्रत्येकं संबध्यत इत्याह - अरीहणादिभ्य इति। पक्षाद्यन्तर्गणसूत्रमाह -पथ इति।
Nyaas¶
औत्सिर्गिकोऽपि तत्रेष्यते इति। यद्येवम्, तस्य श्रवणं प्राप्नोतीत्यत आह - तस्य च इत्यादि। तथा चोक्तम् इत्यादि। तदेव द्रढयति - औत्सर्गिक इत्येव। शिरीषाणामदूरभवो शिरीषाः, तस्य वनं शिरीषवनमिति भाष्यकारवचनाल्लभ्यते। विशेषविहितानांहि लुपा न भवितव्यम्। अत औत्सर्गिकस्य लुब्भवतीति विज्ञायते॥
Prakriyasarvasvam¶
अरीहणादिभ्यः सप्तदशभ्यो गणेभ्यः क्रमाद् वुञादयः सप्तदश स्युः । अरीहणादेर्बुञ्—आरीहणकम् । द्रौघणकम् । कृशाश्वादेश्छण्—कार्शाश्वीयम् । ऋश्यादेः कः—ऋश्यकम् अश्मकम् । कुमुदादेष्ठच्—कुमुदिकम् । काशादेरिलः — <karika>काशिलो वनिलः कर्पूरिलः कर्दमिलस्तथा । पलाशिलः कण्टकिलस्तृणिलो देशवाचकाः ॥ २३४ ॥</karika> तृणादेः सः—तृणसः । प्रेक्षादेरिनिः—प्रेक्षी । अश्मादे रः—अश्मरः । सख्यादेर्ढञ् — साखेयम् । सङ्काशादेर्ण्यः—साङ्काश्यः । काम्बिल्यः । वलादेर्यः —बल्यम् । पक्षादेः फक्—पाक्षायणः। कर्णादेः फिञ्—कार्णायनिः । सुतङ्गमादेरिञ् —सौतङ्गमिः । ‘इञः स्त्रियां ङीष् वाच्यः । सौतङ्गमीति नगर्यादौ । प्रगदिनादेर्ण्यः । ‘नस्तद्धिते’ (६-४-१४४) । प्रागद्यम् । वराहादेः कक्—वाराहकम् । कुमुदादेष्ठक्— कौमुदिकम् । देशनामतत्वादप्रसिद्धेर्गणानुक्तिः ॥